विशेषता
गाय की विशेषताएँ
मूल विशेषताएँ :
- भारतीय गायें बास इंडिकस प्रजाति की हैं ।
- ऊँचे स्कंध, झूलता गलावलंब और पीठ पर सूर्यकेतु स्नायु इस नसल की पहचान है ।
- ऐसा माना जाता है कि सूर्यकेतु स्नायु वातावरण से औषधीय तत्व प्राप्त करता है । जिससे गोबर, गोमूत्र और गो-दुग्ध अधिक पोषक बनते हैं ।
त्वचा :
- गर्दन के नीचे झूलते गलावलंब और लंबे कानों के कारन त्वचा का पसीजता क्षेत्र बढ़ जाता है । फलतः शरीर ठंडा रहता है । जो हमारी जलवायु के लिए उपयुक्त है ।
- पसीने की ग्रंथियाँ चौड़ी और पसीना सुगंधित होने के कारण मानसूनी कीटों से बचाव होता है ।
- गाय अपनी पेशियों के त्वरित संचालन से कीटों को भगा देती है ।
- छोटे बालों के कारन त्वचा स्वच्छ रहती है ।
- इन सब अनोखे गुणों की बदौलत भारतीय बैल धूप और बरसात दोनों में सुचारू रूप से कार्य कर सकतें हैं ।
पूंछ :
- जमीन को छूती हुई ।
- पूंछ का जोड़ अनोखा है और यह गर्दन तक लिपट सकता है ।
- मक्खियों और कीटों को भगाती है ।
खुर :
- जुड़े हुए होने के कारण टहनियां और धूल नहीं चिपकते ।
- भारतीय बैल का खुर छोटा और मजबूत होता है । जिससे जुताई और गाड़ी खींचना सहज हो जाता है ।
- कई भारतीय बैल घोड़े के सूमो के बिना काम कर पाते हैं ।
- ट्रैक्टर के विपरीत बैल, भूमि सतह को कठोर नहीं करता और न ही सहायक कीटों को मारता है ।
गुणसूत्र (क्रोमोसोम) :
- शरीर के विभिन्न गुण धर्म और कार्यकलाप इनसे नियंत्रित होते हैं ।
- गाय बैलों के शरीर में पर्याप्त ‘वै’ गुणसूत्र होने के कारण वह पीढ़ियों तक वंध्या नहीं होती ।
जीवन वैशिष्ट्य :
- बेस मेटाबोलिक दर नाम है शरीर द्वारा विश्रामावस्था में श्वास एवं तापमान बनाये रखने जैसी आवश्यक प्रक्रियाओं के संचालन में खर्च की जाने वाली ऊर्जा का ।
- भारतीय गायों में यह दर कम होता है । अतः सूखा पड़ने पर यह थोड़े भोजन से निर्वाह कर लेती हैं । फलतः दुर्बल होने पर भी यह पोषण पाकर पुनः शीघ्र शक्तिशाली बन जाती हैं । ऐसी अस्थायी मुश्किलों के बाद के समय में इसकी दूध उत्पादन या प्रजनन क्षमता प्रभावित नहीं होती ।
रोग प्रतिरोधक क्षमता :
- गायों में जन्मजात रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है । इस में चरागाहों में चरने वाली या छप्पर तले रहने वाली गायों में कोई अंतर नहीं होता ।
- इससे उन पर होने वाला चिकित्सा व्यय कम होता है ।
- इसी कारण अमेरिका और यूरोप, भारतीय गायों का आयात कर उनसे संकर प्रजनन के माध्यम से अपनी स्थानीय प्रजातियों की रोग प्रतिरोध क्षमता में सुधार करतें हैं ।
कार्य कुशलता :
- भारतीय बैल के मजबूत मांस पेशियाँ और लंबे पाँव होते हैं । वह कठिन परिस्थितियों में भी घंटों काम करते हैं ।
- ऊँचे कंधे हल अच्छी तरह उठाते हैं ।
देख-भाल :
- गायों को एक अति साधारण छप्पर या मात्र एक वृक्ष के नीचे रखा जा सकता है ।
- कुछ भारतीय प्रजातियों को बहुत कम आहार की आवश्यकता होती है ।
- गांवों में साधारणतया दिनभर वे खेतों और वनों में विचरन करती रहती हैं ।
दूध :
- कुछ भारतीय प्रजातियाँ २० लीटर तक दूध प्रतिदिन दे सकती हैं ।
- दुधारु भारतीय गायों में प्रमुख हैं – गीर, साहिवाल, थारपरकर, राठि एवं सिंबधी ।
- अन्य प्रजातियों को हम बेहतर देखभाल और पोषण से सुधार सकते हैं ।
पंचगव्य :
- यह दूध, दही, घी, गोमूत्र एवं गोबर का सामूहिक नाम है ।
- इनका उपयोग आहार, औषधि, खाद एवं कीटनियंत्रक के रूप में होता है ।
- यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ातें हैं ।
- बिना किन्हीं दुष्प्रभावों के ये कैंसर, तनाव, उच्चरक्तचाप, चर्मरोग और मूत्र संबंधित रोगों से लड़ते हैं ।




