सच्चा स्वतंत्रता संग्राम
यह सच्चा स्वाधीनता आंदोलन अंतिम हो
प्रत्येक व्यक्ति को अपनी स्वाधीनता प्रिय है और वह उसे बनाये रखने की चेष्टा करता है । १८५७ में हुआ भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास में एक सीमा चिन्ह है । बंदूकों की गोलियों पर गाय या सुअर के मांस की चर्बी चढ़ी होने की अफवाहों ने आंदोलन को चिंगारी दिखाई । लेकिन देश की स्वाधीनता की आशा प्रज्वलित होकर बुझ गई ।
महात्मा गांधी द्वारा हमारे स्वाधीनता आंदोलन के विचारों और प्रयासों को सघन करते तक छिटपुट संघर्ष, विरोध, लडाइयों और हत्यायें होती रहीं । लोगों के मन में ठोस ढांचे वाले स्वतंत्र राष्ट्र की कल्पना नहीं थी । महात्मा गांधी ने जीवन के विभिन्न क्षेत्र के भारतीयों के स्वप्नों और महत्वाकांक्षाओं को दृढ़ करने वाले एक ढ़ांचे की परिकल्पना दी । किसान, उद्योगपति, कलाकार, पत्रकार और आम नागरिक सभी ने यह जाना कि उनका ईमानदारी और समर्पित होकर किया गया कार्य भी स्वतंत्रता संग्राम का भाग था । अंततः १५ अगस्त, १९४७ को हमें आजादी मिली ।
इस आनंद के साथ ही मोह भी भंग हुआ । राष्ट्रपिता गांधीजी ने समृद्ध कृषि, पशु फार्म और हस्तशिल्प रामराज्य का स्वप्न देखा था जिसमें ग्राम आत्मनिर्भर और स्वतंत्र हों । उन्होंने हमारे लोगों की अलग पहचान का सपना देखा जिसमें बाहरी लोगों की नकल नहीं करनी थी । यद्यपि उनका चिंतन ठोस और यथार्थवादी था, पर वह एक सपना मात्र रहा ।
स्वतंत्रता के साथ देश का विभाजन भी हुआ और हमारी उपजाऊ भूमि का एक बड़ा भाग पाकिस्तान को चला गया । बांग्लादेश के निर्माण के कारण वहाँ के कष्टों और आस्थिरता का कुछ प्रभाव हम पर भी पड़ा । इसके अतिरिक्त समय-समय पर पड़ने वाले सूखे और बाढ़ द्वारा उत्पन्न संकटों ने हमारे देश को उन वर्षों में तात्कालिक समाधानों के लिये विवश किया ।
संकट की उस घड़ी में हमें बाहरी तकनीक और विधियों में आशा की किरण दिखाई दी । हमने जोतने के लिए ट्रैक्टर और फसल काटने के लिये टिलर अपनाये । हमने संकर बीज बोये, पौधों को कृत्रिम खाद दी और रासायनिक कीटनाशकों द्वारा उनकी रक्षा की । विशाल बांधो के जल द्वारा सिंचाई कर हमने वर्ष में तीन फसलें उगाईं । बाजार में जल्द बिकने वाली फसलों पर जोर दिया गया, परिणामतः खाद्यान्न उगाने वाले खेत नकद फसलों में, बगीचों में बदल गये । कर्ज पर निर्भरता बढ़ी । बैल और बूढ़ी गायों को वधशालाओं में भेज दिया गया । जर्सी और एच.एफ. गायों ने अधिकांश घरों में भारतीय नस्लों का स्थान ले लिया । कुछ वर्षों में हरित क्रांति और श्वेत क्रांति पर ध्यान केंद्रित हो गया और गुणवत्ता का स्थान परिमाण ने ले लिया ।
आगे जाकर औद्योगिक प्रगति और सूचना प्रौद्योगिकी सामने आईं । इन सब बदलावों के कारण लोग गांवों से शहरों की तरफ आकर्षित हुए । शहरों में युवा पीढ़ी के लिये नये उभरने वाले व्यवसायों में लाभप्रद रोजगार के अवसर मिलने लगे । आज की पीढ़ी अपने बच्चे को जन्म से ही शहर भेजने की तैयारी करती है । यह पीढ़ी गाँव, खेती, पशुधन, ग्राम, घर और यहाँ तक कि माता-पिता का भी नहीं सोचती । यदि बाजार में सभी आवश्यकतायें पूर्ण हो जायें तो साधन की क्या चिंता ? जब आपको पाउच में दूध मिले तो फिर गाय की क्या परवाह ?
हम सोचते हैं विदेशी कृषि विधियों से हानि हुई है, किसान फंस गया है । भूमि का महत्व घट रहा है और किसान बीज, खाद और कृषि उपकरणों के लिये बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भर है । किसान असह्य ऋण के बोझ से टूट रहा है । यदि इन समस्याओं का समाधान नहीं है तो किसान आत्महत्या की ओर बढ़ता है ।
शहरों में हालात भी अच्छे नहीं है । शहरों की ओर अबाधित, अमर्यादित व स्थानांतरण से ढ़ाचागत सुविधायें अपर्याप्त हो गई है, जिससे नागरिकों का दम घुटता है । नौकरियों पर निर्भरता निराशाकारक है । गाँव और शहर दोनों बाहरी समाधानों की प्रतीक्षा में हैं । 
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी ने अपने चर्खे को प्रतीक बनाकर सारे देश को एक सूत्र में पिरोया । लेकिन हमें सच्ची आजादी नहीं मिली । हमारा यह स्वतंत्रता संघर्ष अंतिम हो । स्वाधीनता के इस दूसरे संघर्ष में, पवित्र गाय हमारा नेतृत्व करेगी । गाय जो हमारी माताओं तक को दूध पिलाती हैं, हमारी आशा की ज्योति है । विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के माध्यम से गाय एकता क संदेश सारे देश पहुँचायेगी । हमें प्रसन्नता है कि इस सत्कार्य में सभी गो भक्त संगठित हो रहे हैं ।



