अनूठी योजना

अमृत महल गायों के विकास की एक अनूठी योजना

अमृत महल, भारतीय नसल

अमृत महल, भारतीय नसल की गाय

  • मैसूर के राजाओं ने इस योजना को आरंभ किया था ।
  • १६१७ से १७०४ के मध्य वोडेयर वंश के चामराज वोडेयर, कंठीरव नरसराज वोडेयर, चिक्कदेवराज वोडेयर के शासनकालों में यह अपने चरमोत्कर्ष पर थी ।
  • योजना को ‘बेण्णे चावडी’ गायों जिन्हें अब अमृत महल कहा जाता है, के लिये शुरू की गयी ।
  • योजना के लिये राज्य में २४० मैदानों की ४,१३,५३९ एकड़ भूमि को सुरक्षित किया गया ।
  • अज्जंपुर, बीरूरु, हब्बनघट्ट, बासूरु, लिंगदहळ्ळि और अर्सिकेरे इसके मुख्य केंद्र थे ।
  • टीपू सुल्तान ने गायों का नाम बदल कर अमृत महल रखा और इसी नाम से भूमि सुरक्षित कर दी ।
  • टीपू ने इन गायों की उत्कृष्टता को पहचान कर अपने सेना का भाग बनाया । आज भी इस नसल के बैलों का महत्व गायों से अधिक माना जाता है ।

    मैसूर पैलेस

    मैसूर पैलेस

  • यह गायें कुत्तों से अधिक वफादार होती है और गरजती बंदूकों से भी भयभीत नहीं होतीं ।
  • चूँकि इन गायों का युद्ध के लिये पालन किया जाता था, इन की दूध की उपज ११ से घटकर २-३ लीटर घट गई । शोधों से पता चलता है कि १० वर्षों में २-३ पीढ़ियों के दौरान इसे बढ़ाया जा सकेगा ।
  • योजना में ६ चरागाह क्षेत्र थे । जब गायें एक क्षेत्र में चरना पूर्ण कर लेती तो उन्हें दूसरे क्षेत्र में भेज दिया जाता । गायों के लिये अलग चारे की व्यवस्था नही थी ।
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के समय कर्नाटक सरकार के पास चरागाहों की भूमि ५०,००० एकड़ थी ।
  • आज २२,००० एकड़ भूमि और १५०० गायें ही बची हैं ।

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